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ठीक उस जगह


एक गुरू जी नदी के तट पर ध्यान अवस्था में बैठे थे। उनके एक शिष्य ने उनके चरणों में श्रद्धा एवं समर्पण के प्रतीक के रूप में दो बेशकीमती मोती रखे। गुरू जी ने अपनी आँखें खोलीं, उनमें से एक मोती को उठाया और उसे इतनी असावधानी से पकड़ा कि वह उनके हाथ से छिटक कर लुढ़कता हुआ नदी में चला गया। शिष्य ने आव देखा न ताव, नदी में छलांग लगा दी। उसने कई गोते लगाये पर मोती को ढ़ूँढ़ने में असफल रहा। अंततः थककर उसने पुनः अपने गुरू का ध्यान भंग किया और बोला - "आप उस जगह को जानते हैं, जहाँ वह मोती गिरा है। कृपया मुझे वह जगह बता दें ताकि मैं आपके लिये मोती खोज़ कर ला सकूं। गुरू जी ने दूसरा मोती अपने हाथ में लिया और पानी में फेंकते हुए बोले - "ठीक उस जगह।'



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