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क्रोध


एक 15 – 16 साल का लड़का जिसका नाम राम था उसे बहुत गुस्सा आता था। गुस्से में वह अपनी किताबे फाड़ देता या अपने गुस्से को अपने दोस्तों या भाई -बहन पे निकालता था। उसके पिता उसके गुस्से से बहुत परेशान थे। एक बार उसके पिता ने उसे बुलाया और उसे बहुत सारी कीलें दी और कहा जब भी तुम्हे गुस्सा आया करे तुम इनमें से एक कील घर से बाहर लगे पेड़ पर ठोक दिया करो। लड़के ने अपने पिता की बात मानी और वह ऐसा ही करता जब भी उसे गुस्सा आता वह एक कील उठाता और पेड़ में ठोक देता। कुछ दिनों तक ऐसे ही चलता रहा लड़के ने देखा की पेड़ का सारा तना तो कीलों से भर गया है अब वह कील कहा ठोके। उसे गुस्सा आया और वह अपने पिता के पास गया और सारी बात बताई, पिता ने कहा बेटा उन कीलों को निकाल दो और फिर से उसी पेड़ पे कील ठोको। वक़्त गुजरता गया, लड़के का गुस्सा कम नहीं हुआ परन्तु बार -बार कील ठोकने के कारण वह पेड़ बहुत ही खराब हो गया था। लड़के ने पिता से बोला की अब वह किसी और पेड़ पे कील ठोका करेगा क्यूंकि वह पेड़ तो बहुत खराब हो चुका है और अगर अब वह उसमें कील ठोकेगा तो वह इतना कमजोर हो जायेगा की हल्की सी आँधी तूफान आने पर गिर जायेगा। पिता अपने बेटे का हाथ पकड़कर उस पेड़ के पास ले गए जो कील ठोक के बहुत कमजोर और भद्दा दिखने लगा था। पिता ने कहा देखो बेटा अब यह पेड़ पहले जिनता खूबसूरत नहीं रहा और पहले की अपेक्षा कमजोर भी हो गया है। इसी तरह जब तुम अपना गुस्सा दुसरो पे निकालते हो तब उनके मन पे भी कुछ इसी तरह के निशान हो जाते हैं। तुम्हारे लगातार गुस्से से ये निशान इतने अधिक हो जायेंगे कि या तो तुम्हारे रिश्ते कमजोर और भद्दे दिखने लगेंगे या फिर खत्म ही हो जायेंगे। अगर तुम दुसरो के पेट में छुरा घोंपकर बाद में हजारों बार माफी मांग भी लोगे तो उससे क्या होगा, तुम उस नुकसान की भरपाई कर सकते हो परन्तु उस घाव के निशान हमेशा बने रहते हैं। लड़के को अपने पिता की बात अच्छे से समझ में आ गई और उसने कभी ना गुस्सा करने का प्रण किया।



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